पिछले 20 सालों के निचले स्तर पर पहुंचा यूरो, पाउंड

Euro Pound Value: पूरी दुनिया में मंदी की आशंका है। कुछ देशों में उसके असर भी देखे जाने लगे हैं। महंगाई (Inflation) बढ़ने लगी है। रोजगार (Job) में कमी आने लगी है। उन देशों की करेंसी कमजोर होनी शुरु हो गई है। इस समय दुनिया की सबसे मजबूत करेंसी कही जाने वाली पाउंड और यूरो अपने बूरे दौर से गुजर रहे हैं। ब्रिटेन (Britain) की करेंसी लगातार गिर रही है। यूएस डॉलर (USD) के मुकाबले पाउंड (Pound) कमजोर होता जा रहा है। यही हाल यूरो (EURO) का भी है।

आज से ठीक एक महीने पहले यानि 10 अगस्त को एक पाउंड की कीमत 1.22 डॉलर हुआ करती थी जो आज 10 सितंबर को गिरकर 1.16 डॉलर प्रति पाउंड हो गई है। यूरो भी एक महीने में 1.03 डॉलर प्रति यूरो से कमजोर होकर आज 1.02 डॉलर पर आ गया है। इसका फायदा भारत को मिल रहा है और भारतीय रुपया पाउंड और यूरो के मुकाबले लगातार मजबूत हो रहा है। इसके पीछे की एक वजह यह भी है कि इस समय भारत की स्थिति बेहतर है और एक्सपर्ट का कहना है कि भारत में मंदी आने की कोई संभावना नहीं है।

पाउंड की तुलना में रुपया कितना हुआ है मजबूत

पिछले महीने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि भारतीय रुपया 2022 में ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले मजबूत हुआ है। इसमें आगे और सुधार देखने को मिलेगा। इस समय 1 पाउंड की कीमत 92.41 रुपये है जो महीने भर पहले 5 अगस्त को 96.59 रुपये प्रति पाउंड थी। एक महीने में भारतीय रुपया पाउंड के मुकाबले में 4.18 रुपया मजबूत हुआ है। एक महीना पहले एक यूरो की कीमत 81.46 रुपये हुआ करती थी जो आज गिरकर 80.87 रुपये प्रति यूरो हो गई है।

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डॉलर के मुकाबले पाउंड और यूरो की वैल्यू में आई गिरावट

यूरो अपने सबसे बुरे दौर में कैसे पहुंचा

यूरोप और लगभग पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण यूरोप के कई देश महंगाई का सामना कर रहे हैं। खासकर ऊर्जा क्षेत्र में रूस के तरफ से हाल ही में लिए गए नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन को पूरी तरह से बंद करने के निर्णय ने स्थिति को और भयावह बना दिया है। इस आदेश के बाद से यूरोप में गैस और तेल जैसे ऊर्जा स्रोतों की लागत में बढ़ोतरी आई है, जो EURO की वैल्यू को कम करने में एक महत्वपूर्ण भुमिका निभा रहे हैं। यूरोपीय संघ की सांख्यिकी एक महीने के लिए डॉलर और यूरो का पूर्वानुमान एजेंसी द्वारा जारी किए जाने वाले आंकड़ों के अनुसार यूरोज़ोन की मुद्रास्फीति की वार्षिक दर जुलाई में बढ़कर 8.9% हो जाएगी, जो जून में 8.6% थी। बता दें, इस समय प्रति यूरो जो डॉलर की कीमत है वो पिछले 20 सालों का सबसे न्यूनतम स्तर है। अगर ये गिरावट जारी एक महीने के लिए डॉलर और यूरो का पूर्वानुमान रही तो जल्द ही एक यूरो की कीमत डॉलर के बराबर हो जाएगी।

15 जुलाई 2002 को डॉलर के बराबर था यूरो

1 जनवरी 1999 को लॉन्च होने के तुरंत बाद यूरोपीय मुद्रा 1.18 डॉलर प्रति यूरो के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई थी, लेकिन ज्यादा दिनों तक यह टिक नहीं सकी। फरवरी 2000 में यूरो की कीमत 1 डॉलर से भी कम हो गई और अक्टूबर आते-आते में 82.30 सेंट के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई थी। फिर धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हुआ और 15 जुलाई 2002 को यूरो एक डॉलर के बराबर पहुंच गई। उसके बाद से यूरो में इतनी गिरावट नहीं देखी गई जो आज देखी जा रही है।

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पाउंड की हालत इतनी खराब क्यों?

यूके की राजनीति से लेकर यूके की अर्थव्यवस्था में इस समय अनिश्चितता का माहौल है। हाल ही में वहां चुनाव हुए हैं। नए पीएम बनाए जाएंगे। कहा जाता है कि बाजार में अगर आप मजबूती चाहते हैं तो अनिश्चितता को दूर करना होगा। इसकी दूसरी और यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलना ब्रिटेन को भारी पड़ रहा है। इसका नुकसान ब्रिटेन के व्यापारियों को उठाना पड़ रहा है। उन्हें पहले की तुलना में अधिक टैक्स देना पड़ रहा है। पहले जब ब्रिटेन EU का हिस्सा था तब यूरोपीय यूनियन में शामिल किसी भी देश से व्यापार करने के लिए टैक्स नहीं देना पड़ता था। उससे उसकी अर्थव्यवस्था को काफी फायदा मिलता था जो अब बंद हो गया है। इस समय वहां महंगाई भी चरम पर है। लोगों को रोजगार कम मिल रही है। ये समस्या सिर्फ ब्रिटेन में ही नहीं बल्कि उसके अन्य पड़ोसी देशों में भी है।

Britain की महंगाई 40 साल के उच्चतम स्तर पर

Britain की महंगाई दर जुलाई में बढ़कर 40 साल के नए उच्चतम 10.1 प्रतिशत पर पहुंच गई। दरअसल, खाने-पीने के सामान के दाम बढ़ने और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के चलते महंगाई में यह उछाल आया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (ओएनएस) ने बुधवार को कहा कि उपभोक्ता मूल्यों पर आधारित मुद्रास्फीति दो अंकों में पहुंच गई है, जो जून में 9.4 प्रतिशत से अधिक थी। यह आंकड़ा विश्लेषकों के 9.8 प्रतिशत के पूर्वानुमान से अधिक है।

डॉलर क्यों हो रहा मजबूत?

डॉलर के लगातार मजबूत होने से दुनिया भर की करेंसी पर असर दिखने लगा है। रुबेल से लेकर पाउंड और यूरो की कीमतों में भी बदलाव देखा जा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण हैं अमेरिका द्वारा लगातार अपने नीतिगत फैसलों में उलटफेर करना। हाल ही में Fed ने भी 0.75 बेसिस प्वाइंट की टैक्स रेट में वृद्धि की थी। Fed अमेरिका का केंद्रीय बैंक है। टैक्स रेट में वृद्धि करने से दुनिया भर के इन्वेस्टर को अमेरिका आकर्षित करने लगा, क्योंकि अगर आप अमेरिका में पैसा इन्वेस्ट करते हैं तो आपको पहले की तुलना में ज्यादा रिटर्न मिलेगा। दूसरी सबसे बड़ी बात यह होगी कि इन्वेस्टर को करेंसी डॉलर में कंवर्ट भी एक महीने के लिए डॉलर और यूरो का पूर्वानुमान नहीं करनी पड़ेगी। किसी भी देश में जब निवेश बढ़ता है तो उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और इसका असर उस देश की करेंसी पर भी देखने को मिलता है। यही कारण है कि USD लगातार मजबूत होती जा रही है।

जैसा कि हम जानते हैं कि अमेरिकी डॉलर एक वैश्विक मुद्रा है। दुनिया भर केंद्रीय बैंको में जो विदेशी मुद्रा भंडार है उसका 64% अकेले अमेरिकी डॉलर है। दुनिया भर में अधिकतर देश डॉलर में व्यापार करते हैं। यही सब कारण अमेरिकी डॉलर को और मजबूत बनाता है। इस समय दनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश अमेरिका है। उसके पास 25,350 अरब डॉलर की संपत्ति है।

डॉलर के मुकाबले क्यों गिरता जा रहा है रुपया, भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा इसका असर? | Explained

Dollar Vs Rupee : डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. भारत का केंद्रीय बैंक जो रुपया का संरक्षक है. रुपये की कमजोरी को रोकने की उसकी कोशिशें कामयाब नही हो पा रही है. इससे इस बात की संभावना बढ़ती जा रही है कि आने वाले दिनों में महंगाई और परेशान कर सकती है.

Published: September 28, 2022 12:37 PM IST

Dollar Vs Rupee (Symbolic Image)

Dollar Vs Rupee : अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया जुलाई 2022 से 79-80 के बीच उतार-चढ़ाव कर रहा है. डॉलर इंडेक्स 104.30 के स्तर से बढ़ रहा है. यूएस फेड ने अपनी पिछली बैठक में ब्याज दरों में 75 बीपीएस की बढ़ोतरी एक महीने के लिए डॉलर और यूरो का पूर्वानुमान की और नवंबर में इसे 75 बीपीएस और दिसंबर में 50 बीपीएस बढ़ाने का संकेत दिया है.

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डॉलर इंडेक्स जो उस समय 107 पर था, बढ़कर 111.60 पर पहुंच गया है. यूरो नीचे गिरकर 0.98 और GBP अपने 20 साल के निचले स्तर 1.12 पर आ गया. डॉलर इंडेक्स अभी भी 112 के स्तर की ओर तेजी से जाता हुआ देखा जा रहा है.

21 सितंबर को यूएस फेड की घोषणा के एक महीने के लिए डॉलर और यूरो का पूर्वानुमान बाद, इक्विटी में गिरावट आई, एशियाई मुद्राओं में गिरावट आई और बाजारों में जोखिम-रहित भावना बनी रही.

यूएस डॉलर 2-वर्ष की यील्ड 4.10% को पार कर गई, जबकि 10-वर्ष 3.50% पर थी. परिणामस्वरूप विपरीत यील्ड वक्र बना, जिससे अमेरिका में मंदी का संकेत मिल रहा है.

रूस-यूक्रेन युद्ध, गैस आपूर्ति के मुद्दों और लगभग दो अंकों की मुद्रास्फीति के कारण यूरोप पहले से ही मंदी के दौर से गुजर रहा है.

आरबीआई जो रुपये का संरक्षक है, उसकी कोशिश थी कि यह 80 के स्तर को न पार करे. लेकिन आरबीआई अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हो पाया और 22 सितंबर को रुपया 80.98 के अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गया और 23 सितंबर 2022 को 81.25 का एक नया इंट्रा-डे लो बना दिया और आज यानी बुधवार को यह अभी तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. आज एक डॉलर की कीमत 81.93 रुपये हो गई है.

प्रति माह 30 अरब डॉलर के व्यापार घाटे और 2013 के बाद से जीडीपी के 3.5% के सीएडी की वजह से रुपये में कमजोरी दिखाई एक महीने के लिए डॉलर और यूरो का पूर्वानुमान दे रही है. कच्चे तेल की कीमतें फिलहाल कम्फर्ट लेवल पर हैं. अमेरिका में मंदी की चिंताओं से यह फिलहाल 100 डॉलर से नीचे है.

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) जो सितंबर के दौरान इक्विटी के खरीदार और रुपये के विक्रेता थे, फिर से विक्रेता बन सकते हैं जो रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं.

फेड ब्याज दर के मोर्चे पर लगातार बना हुआ है. डॉलर और रुपये के बीच ब्याज दर का अंतर 2022 में 4.5% के उच्च स्तर से वर्तमान में 2.9% तक धीरे-धीरे कम हो रहा है. यह अंतर रुपया पर दबाव डाल रहा है.

एशियाई मुद्राएं भी कमजोर बनी हुई हैं, और अधिकांश में 10-15% की गिरावट आई है. 21 सितंबर तक रुपये में केवल 7.5% की गिरावट आई थी, जबकि आज तक मूल्यह्रास 8.5% हो गया है.

वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरें रुपये के गिरते प्रदर्शन का एक प्रमुख कारण हैं. बैंक ऑफ इंग्लैंड ने गुरुवार को बढ़ती मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ब्याज दर में एक और आधा प्रतिशत की वृद्धि का विकल्प चुना, यह चेतावनी देते हुए कि अर्थव्यवस्था पहले से ही मंदी में थी. इसने अपनी ब्याज दर 1.75 फीसदी से बढ़ाकर 2.25 फीसदी कर दी.

बीते हफ्ते बुधवार को, यूएस फेड ने 0.75 प्रतिशत अंक की अपनी तीसरी सीधी वृद्धि की घोषणा 3 से 3.25 प्रतिशत की सीमा में की. पूर्वानुमान के अनुसार, 2022 के अंत तक दरों के 4.4 प्रतिशत और 2023 तक 4.6 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है. नवंबर की बैठक से दर में चौथी-सीधी 75 आधार-बिंदु वृद्धि की उम्मीद है.

भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

रुपये के कमजोर होने का सबसे बड़ा असर मुद्रास्फीति पर पड़ता है, क्योंकि भारत अपने कच्चे तेल का 80% से अधिक आयात करता है, जो भारत का सबसे बड़ा आयात है.

तेल दो महीने से अधिक समय से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मंडरा रहा है और कमजोर रुपये से मुद्रास्फीति के दबाव में इजाफा होगा. भारत उर्वरकों और खाद्य तेलों के लिए भी अन्य देशों पर बहुत अधिक निर्भर है. क्रिसिल के अनुसार, देश का उर्वरक सब्सिडी बिल इस वित्त वर्ष में 1.9 ट्रिलियन रुपये के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंचने के लिए तैयार है.

कमजोर रुपया जहां आयात को महंगा बनाता है, वहीं इसके कुछ फायदे भी हैं. यह हमारे निर्यातकों को सैद्धांतिक रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है.

भारत के प्रमुख निर्यात आइटम जैसे रत्न और आभूषण, पेट्रोलियम उत्पाद, जैविक रसायन और ऑटोमोबाइल, और मशीनरी आइटम में आयात की मात्रा काफी अधिक है. आपूर्ति की कमी के कारण कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ, निर्यातकों के लिए उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी, जिससे उनके मार्जिन पर असर पड़ेगा.

इसलिए, निर्यात क्षेत्र जहां इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात की तीव्रता अधिक है, में लाभ नहीं देखा जा सकता है. सेवा क्षेत्र जैसे आईटी और श्रम प्रधान निर्यात क्षेत्र जैसे कपड़ा वास्तव में लाभान्वित होंगे.

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कोरोना वायरस के प्रकोप से औंधे मुंह गिरे दुनिया भर के बाजार, आर्थिक मंदी की आशंका गहराई

हांककांग, 12 मार्च (एएफपी) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के चलते एक महीने के लिए ब्रिटेन को छोड़कर बाकी यूरोप से लोगों के अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगाने के बाद दुनिया भर के शेयर बाजार औंधे मुंह गिर गए। इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में भी भारी गिरावट हई और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी की आशंका बढ़ गई। दुनिया भर में इस बीमारी के काबू में आने के संकेत नहीं मिल रहे हैं और इस बीच एक असाधारण संबोधन में ट्रंप ने कहा कि यूरोपीय देशों पर लगाया गया प्रतिबंध 30 दिनों के एक महीने के लिए डॉलर और यूरो का पूर्वानुमान लिए

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Global Trade Forecast: WTO ने वैश्विक व्यापार पूर्वानुमान को एक फीसद घटाया, क्या भारत के लिए है खतरे की घंटी

Global Trade Forecast विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने विश्व व्यापार के आंकड़े जारी कर दिए हैं। इसके अनुसार व्यापार में मंदी आ रही है। भारत पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और देश के सामने कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

नई दिल्ली, बिजनेस डेस्क। Global Trade Forecast: विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने कहा है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण विश्व व्यापार की वृद्धि दर 2023 में धीमी होकर एक प्रतिशत रहने की संभावना है। इसके अलावा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने इस साल वैश्विक व्यापार में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया है, जबकि अप्रैल में 3 प्रतिशत का अनुमान लगाया गया था।

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विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने एक बयान में कहा कि विश्व व्यापार की गति 2022 की दूसरी छमाही में कम होने की आशंका है। 2023 में इसके घटकर और धीमा होने की आशंका है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का कहना है कि इन दिनों वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक के बाद एक कई झटकों का सामना करना पड़ रहा है।

अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि 2022 में वैश्विक व्यापार 3.5 प्रतिशत रहेगा। यह अप्रैल में 3 प्रतिशत के पूर्वानुमान से थोड़ा बेहतर है। हालांकि 2023 के लिए अर्थशास्त्री केवल एक प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं। यह पिछले अनुमान 3.4 प्रतिशत से बहुत नीचे है।

क्या होगा इसका परिणाम

विश्व व्यापार संगठन के अनुसार विभिन्न कारणों से प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में विकास धीमा होने के कारण आयात मांग में नरमी आ सकती है। यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा की बढ़ती कीमतें घरेलू खर्च को कम कर देंगी और विनिर्माण लागत बढ़ा देंगी। इसमें आगे कहा गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में, मौद्रिक नीति सख्त होने से आवास, मोटर वाहन और निश्चित निवेश जैसे क्षेत्रों में ब्याज पर आधिरत खर्च प्रभावित होगा।

क्या होगी चीन की स्थिति

चीन कमजोर बाहरी मांग के साथ COVID-19 के प्रकोप और प्रोडक्शन क्राइसिस से जूझ रहा है। ईंधन, खाद्य और उर्वरकों के बढ़ते आयात बिल विकासशील देशों में खाद्य असुरक्षा और ऋण संकट का कारण बन सकते हैं।

भारत के लिए खतरे की घंटी है ये पूर्वानुमान

यह पूर्वानुमान भारत के लिए अच्छा नहीं है। भारत इन दिनों अपने निर्यात को बढ़ाना चाहता है। इंजीनियरिंग, तैयार वस्त्र, कपड़ा और चावल जैसे क्षेत्रों में गिरावट के कारण निर्यात में गिरावट आई है। सितंबर में देश का कुल आउटबाउंड शिपमेंट 3.52 प्रतिशत की गिरावट के साथ 32.62 बिलियन अमरीकी डालर हो गया, जबकि व्यापार घाटा बढ़कर 26.72 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गया। ये वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी प्रारंभिक आंकड़े के अनुसार है।

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